पाजेब कहानी की तात्विक समीक्षा / Pajeb Kahani ki tatvik Samiksha

 लेखक - राहुल मौर्य



पाज़ेब कहानी जैनेंद्र जी की मुख्य कहानियों में से एक है जिसे मैं शैली में लिखा गया है इस कहानी के मूल में बाल मनोविज्ञान है, आइए इस कहानी की तात्विक समीक्षा करते हैं-


उद्देश्य


पाजेब कहानी में लेखक ने बड़ी कुशलता से पाठकों के मध्य माता पिता द्वारा अपने बच्चों के प्रति अकारण कठोर व्यवहार को लेकर पछतावा एवं पीड़ा और साथ ही साथ बाल मन की सरलता एवं अबोधता को बड़े स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है।

बाल मनोविज्ञान पर आधारित इस कहानी का मुख्य उद्देश्य पाठकों के मन को बच्चों की व्याकुलता एवं उनके निरपराध होने के बाद भी अपराध स्वीकार करने की परिस्थितियों से जोड़ने का है, अतः यदि हम उद्देश्य को केंद्र में रखकर इस कहानी पर बात करें तो उद्देश्य कहानी के अंदर घुला हुआ है ना कि स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर है इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि लेखक द्वारा छुपे हुए अंदाज में उद्देश्य की अभिव्यक्ति इस कहानी की मजबूत कड़ी है।

कथानक


लेखक द्वारा इस कहानी में बड़े ही अद्भुत ढंग से सम्यक घटनाएं एवं वर्णन किए गए हैं, लेखक ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि घटनाएं एवं वर्णन उतने ही किए जाएं जितने कहानी को समग्र रूप से गतिशील रखने में सहायक हों।

इस कड़ी में यदि हम आशुतोष द्वारा साइकिल के लिए जिद के प्रसंग की बात करें या फिर आशुतोष द्वारा उसकी मां के साथ पाजेब ढूंढवाने के प्रसंग पर विचार करें या अन्य किसी भी प्रसंग को देखें तो हम पाएंगे कि सभी प्रसंगों ने कहानी को एक डोर से जोड़ने का कार्य किया है जो की आवश्यक भी है, कहानी में घटनाओं एवं प्रसंगों को इस प्रकार से रखा गया है कि मानो पहली घटना व प्रसंग दूसरी घटना व प्रसंग की भूमिका में हो और यही कहानीकार द्वारा घटनाओं में निरंतरता एक सामान्य गति का निर्धारण करती है जो कि पाठकों के लिए कहानी को और रोचक बना देती है, यदि हम उपरोक्त बातों के आधार पर बात करें तो हम यह पाएंगे कि कहानीकार ने कथानक के कसाव पर बल दिया है अतः कथानक की कसौटी पर भी यह कहानी खरी उतरी है।

कथावस्तु


यदि हम कहानी की विषय वस्तु पर बात करें तो हम आम जनजीवन से इसे जोड़ सकते हैं अमूमन हम देखते हैं कि कई बार बच्चों के व्यवहार के कारण उन पर अकारण ही दोषारोपण किया जाता है जोकि सरासर गलत बात है, माता पिता एवं घर के बड़ों को कई बार ऐसा लग जाता है कि गलती उनके बालकों की ही होगी हालांकि जब अपराध सिद्ध नहीं हो पाता तब उन्हें अपने द्वारा दोषारोपण एवं कठोर व्यवहार के लिए शर्मिंदगी भी महसूस होती है। कहानी में भी हमें कुछ ऐसे ही भाव मिलते हैं जहां आशुतोष के माता-पिता द्वारा आशुतोष को अकारण ही अपराधी समझा जाता है और अकारण ही उसे दंड एवं कठोर बातों का सामना करना पड़ता है,
अब यदि हम इन संदर्भों को केंद्र में रखकर देखें तो हम यह कह सकते हैं कि विषय वस्तु काल्पनिक ना होकर आम जन जीवन के यथार्थ को प्रस्तुत करती है अतः कथावस्तु की दृष्टि से यदि हम बात करें तो हम पाएंगे कि इस कहानी की कथावस्तु विश्वसनीय है जो कि इस कहानी का महत्वपूर्ण पक्ष है।

पात्र व चरित्र


कहानी पाजेब में लेखक ने पात्रों का विशेष ध्यान रखा है इस श्रंखला में यदि हम देखें तो आशुतोष उसके माता-पिता व उसकी बुआ और अन्य सभी चरित्र स्वाभाविक ही प्रतीत होते हैं, इस कहानी में हमें मुख्य पात्र के रूप में आशुतोष दिखता है जिसका स्वभाव एवं व्यवहार कहानी में स्वतंत्र रूप से चित्रित किया गया है।

लेखक ने सभी पात्रों को कहानी की विषय वस्तु के आधार पर ही महत्व दिया है जो कि इस कहानी को बेहतर बनाता है बालकों का बालमन स्वभाव अथवा बड़ों का विवेक पूर्ण स्वभाव उनके स्वतंत्र चित्रण को दर्शाता है जोकि इस कहानी का समीक्षात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु है।

वातावरण


कहानीकार जैनेंद्र ने इस कहानी में कई ऐसे वर्णन किए हैं जहां हमारी आंखों के सामने पूरे प्रसंग का दृश्य बन जाता है जैसे आशुतोष व उसके माता-पिता द्वारा उसका संवाद या फिर मुन्नी द्वारा अपने पिता से पाजेब की जिद, इनके अतिरिक्त भी कई ऐसे प्रसंग हमें इस कहानी में मिलते हैं जो सामान्यतः दृश्य चित्रण कर रहे हैं।

कहानीकार ने इस कहानी में बारीकियों का बड़ा विशेष ध्यान रखा है जैसे बालकों का बालपरक संवाद, घर के अंदर की परिस्थितियों का वर्णन इत्यादि। यह सभी तत्व इस कहानी के वातावरण को और भी अद्भुत रूप से पाठक को प्रभावित करते हैं अतः वातावरण की दृष्टि से भी यह कहानी उत्तम कहानियों की श्रंखला में गिनी जा सकती है।

भाषा शैली


कहानीकार जैनेंद्र ने वैसे तो इस कहानी को मैं शैली में लिखा है परंतु यदि हम पात्रों की बात करें तो कहानीकार ने पात्रों के चरित्र के अनुसार ही उनकी भाषा का निर्धारण किया है, लेखक ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि भाषा शैली के कारण कहीं भी पात्र के मूल व्यवहार का खंडन ना हो।

कहानीकार जैनेंद्र ने स्वयं को मुख्य पात्रों में रखते हुए पिता के व्यवहार अनुसार भाषा का चुनाव किया है इसके साथ ही साथ हमें छुन्नू की मां की भाषा पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए जो कि पात्र के स्वाभाविकपन और स्वतंत्र चित्रण की ओर इशारा करता है इन बातों को ध्यान में रखकर हम यह तो आसानी से कह सकते हैं कि कहानीकार जैनेंद्र ने इस कहानी में भाषा शैली पात्रानुकूल रखी है जो कि एक अच्छी कहानी एवं अच्छे कहानी कार्य की मुख्य विशेषता है।

संवाद योजना


संवाद योजना किसी भी कहानी का महत्वपूर्ण तत्व होता है हालांकि इस दृष्टि से यदि हम कहानी की समीक्षा करें तो हम पाएंगे कि कहानीकार ने कहीं-कहीं संवादों में नाटकीय शैली का भी प्रयोग किया है इसका सबसे अच्छा उदाहरण आशुतोष का उसके पिता के साथ संवाद है जहां आशुतोष हां हां और ना ना में उत्तर देकर अपनी भावाभिव्यक्ति कर रहा है, मैं शैली में लिखे जाने के कारण इस कहानी में एकल संवाद की प्रधानता है परंतु इसके अतिरिक्त कहानीकार ने पात्रों के मध्य सीधे संवाद पर अधिक बल दिया है।

इस कहानी की संवाद योजना पात्रानुकूल होने के साथ-साथ वातावरण को भी केंद्र में रखकर चलती है उदाहरण स्वरूप जहां गंभीर स्थिति है वहां संवाद का स्वरूप भी बदल जाता है अर्थात एक पात्र दूसरे पात्र के शब्दों को बीच में काटते हुए भी दिखता है जोकि संवाद योजना की विशेष विशेषता है अतः यदि हम संवाद योजना की दृष्टि से बात करें तो इस कहानी में हमें उत्कृष्ट संवाद योजना के दर्शन होते हैं।

निष्कर्ष स्वरूप यदि कहा जाए तो कहानी के सभी तत्व उद्देश्य, कथानक, कथावस्तु, पात्र व चरित्र, वातावरण, भाषा शैली और संवाद योजना इन सभी कसौटियों पर यह कहानी खरी उतरी है।

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