राष्ट्रीय एवं सामाजिक जागरण में भारतेंदु युग की भूमिका / Rashtriya avm Samajik Jagran mein Bharatendu Yug ki Bhumika
लेखक - राहुल मौर्य
आधुनिकता किसी भी समाज के लिए उन्नति एवं प्रगति का प्रतीक रहा है और जब हम इसी आधुनिकता को भारतीय हिंदी साहित्य के परिपेक्ष में देखते हैं तो भारतेंदु युग सर्वप्रथम दृष्टिगोचर होता है, निरंतर परिवर्तनशीलता ही किसी विशेष परिवर्तन का सूचक होती है और भारतेंदु युग में भी हमें विशेष परिवर्तन देखने को मिलते हैं जो संभवत रीतिकाल से ही धीरे धीरे गतिमान थे। भारतीय इतिहास की दृष्टि से अट्ठारह सौ सत्तावन का स्वाधीनता संग्राम किसी विशेष घटनाक्रम की शुरुआत को निर्धारित कर रहा था जिसका प्रभाव आगामी समय में भारतीय साहित्य पर भी देखने को मिला और यही घटनागत कालक्रम भारतीय आधुनिक हिंदी साहित्य को विभिन्न युगों में बांटने में सहायक रहा, तो आइए हम इस धटनागत कालक्रम की पहली श्रंखला भारतेंदु युग की भूमिका को राष्ट्रीय एवं सामाजिक जागरण के परिपेक्ष में समझे।
राष्ट्रीय एवं सामाजिक जागरण में भारतेंदु युगीन साहित्य का योगदान-:
भारतेंदु युग में राष्ट्रीय चेतना
मुख्यतः 1850 से 1900 तक भारतेंदु युग मना जाता है, और भारतेंदु युगीन राष्ट्रीय एवं सामाजिक चेतना को देखते हुए ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भारतेंदु युगीन साहित्य को जनोनमुखी साहित्य कहा, जहां एक तरफ रीतिकाल मैं साहित्य दरबार की प्रशंसा, नायिका भेद, नक्शीख वर्णन इत्यादि विषयों पर अपनी रुचि दर्शा रहा था तो वहीं दूसरी ओर भारतेंदु युग आते ही सत्ता के प्रति विद्रोह का स्वर मुखर हो गया। अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति ने साहित्य को राष्ट्रीय एवं सामाजिक समस्याओं पर विचार करने के लिए विवश कर दिया और अंततः यही राष्ट्र एवं समाज के प्रति गंभीरता पूर्वक चिंतन राष्ट्रीय एवं सामाजिक नवजागरण चेतना का मूल सूचक बना। यदि भारतेंदु युग में राष्ट्रीय चेतना की बात की जाए तो भारत दुर्दशा में उल्लेखित इस पंक्ति से हम बहुत कुछ समझ सकते हैं-
"अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी,
पै धन बिदेश चलि जात इहै अति ख़्वारी।"
इन पंक्तियों में जहां एक तरफ राज भक्ति दिखती है तो दूसरी तरफ राष्ट्रप्रेम भी दिख रहा है मसलन जहां एक तरफ अंग्रेजी शासन को भारतेंदु सुख साधन देने वाला बता रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ उन्हें यह भी दुख है कि भारतीय कोष से धन अंग्रेजी शासकों द्वारा ही विदेश जा रहा है इसी प्रकार के राष्ट्रीयता से जुड़े उदाहरण हम भारतेंदु युग की कई रचनाओं में भी देख सकते हैं जैसे एक उदाहरण और देखिए-
"बहुत दिन बीते राम, प्रभु खोयो अपनो देस।
खोवत है अब बैठ के, भाषा भोजन भेष ॥"
(बालमुकुन्द गुप्त)
बालमुकुंद गुप्त अपनी इस रचना में स्पष्ट वर्णन करते हैं कि किस प्रकार अंग्रेजी शासन ने भारतीय संस्कृति को आहत पहुंचाया है वे अपनी इन पंक्तियों में भाषा, पहनावा एवं भारतीय भोजन पर हुए आहत पर चिंता व्यक्त करते हैं। वैसे तो भारतेंदु युग के आरंभिक दौर में अंग्रेजी शासन के समर्थन में कई कवियों ने कई रचनाएं लिखी परंतु आगे चलकर उन्हें यह ज्ञात हो गया कि अंग्रेजी शासकों की कूटनीति और क्रूरता भारत को खंड खंड कर देगी और इसी विचार को भारतीय नव अपने काव्य में भी लिखते हैं वे कहते हैं-
"सत्रु सत्रु लड़वाइ दूर रहि लखिय तमाशा।
प्रबल देखिए जाहि ताहि मिलि दीजै आसा॥"
फूट डालकर राज करने की अंग्रेजी कूटनीति भारतीय साहित्यकारों को बहुत अच्छे से समझ में आ गई इसीलिए उन्होंने राष्ट्रीय जागरण का बिड़ा अपने सर लिया और कई राष्ट्रीय परक रचनाएं लिखी, इसी श्रंखला में जब अंग्रेजी शासकों ने काबुल पर विजय प्राप्त की तब भारत में दिवाली का उत्सव मनाया गया इस पर भारतेंदु युग के कई साहित्यकारों ने खेद एवं चिंता व्यक्त की और इसी सिलसिले में भारतेंदु ने भी कहा-
"आर्य्य गनन कों मिल्यौ, जो अति प्रफुलित गात।
सबै कहत जै आजु क्यों, यह नहिं जान्यौ जात॥
सुजस मिलै अंग्रेज को, होय रूस की रोक।
बढ़ै ब्रिटिश वाणिज्य पै, हमको केवल सोक॥"
उपरोक्त उदाहरण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि भारतेंदु युगीन साहित्य में राष्ट्र के प्रति जागरूकता एवं संवेदनशीलता की नीव भारतेंदु एवं अन्य कवियों ने डाल दी थी जिसका प्रभाव हमें संपूर्ण आधुनिक साहित्य में देखने को मिलता है।
भारतेंदु युग में सामाजिक चेतना
भारतेंदु युगीन साहित्य की विशेषताओं में सामाजिक चेतना एक मुख्य विशेषता है, जब हम भारतेंदु युग की सामाजिक परिस्थितियों को देखते हैं तब हमें यह ज्ञात होता है कि उस युग में नारी, श्रमिक वर्ग, कृषि वर्ग इत्यादि वर्गों का दमन एवं शोषण शुरू हो गया था अंग्रेजी सत्ता ने अपने फायदे के लिए भारतीय संसाधनों का खूब दुरुपयोग किया और इन शोषणकारी नीतियों के खिलाफ जब भारतीय समाजसुधारक जैसे राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे व्यक्ति आए तो वहीं दूसरी तरफ इन समाज सुधारकों से प्रेरणा लेकर भारतेंदु युगीन साहित्यकारों ने भी अपनी रचना में सामाजिक चेतना को स्थान दिया। नारी शिक्षा के विषय में प्रताप नारायण मिश्र जी की यह पंक्तियां देखिए-
"निज धर्म भली विधि जानैं, निज गौरव को पहिचानैं।
स्त्री-गण को विद्या देवें, करि पतिव्रता यज्ञ लेवैं ॥"
भारतेंदु युगीन साहित्यकार जहां एक तरफ नारी शिक्षा को लेकर जागरूक था तो वहीं दूसरी ओर उन्होंने निज भाषा के समर्थन में भी अपना स्वर मुखर किया उदाहरण स्वरुप यह पंक्तियां देखिए-
"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।"
भारतेंदु की इन पंक्तियों के साथ-साथ प्रताप नारायण मिश्र की भी पंक्तियां कुछ ऐसे ही भावों को प्रकट करती हैं-
"जपो निरंतर एक जबान, हिंदी,हिंदू, हिंदुस्तान।"
भारतेंदु युगीन साहित्यकार समाज के प्रति अत्यंत संवेदनशील दिखाई पड़ते हैं क्योंकि वह एक भारतीय होने के नाते भारतवासियों के दुख को अपना दुख समझते और समाज में बंधुत्व भाईचारे की भावना का प्रचार प्रसार करते बंधुत्व की भावना को दिखाते हुए भारतेंदु युगीन साहित्य की एक पंक्ति देखिए-
"हे धनियो क्या दीन जनों की नहिं सुनते हो हाहाकार।
जिसका मरे पड़ोसी भूखा, उसके भोजन को धिक्कार॥"
इस बात में तो कोई दो राय नहीं है कि भारतेंदु युगीन सामाजिक परिस्थितियों में घोर निराशा अंधकार हाहाकार जैसी स्थिति बनी हुई थी शायद इसीलिए साहित्यकारों ने ईश्वर के प्रति अनुराग और दया करने की भावना को अपने साहित्य में सर्वप्रथम रखा, भारतेंदु इस संदर्भ में लिखते हैं-
"कहाँ करुणानिधि केशव सोए।
जगत नाहिं अनेक जतन करि भारतवासी रोए।"
भारतेंदु बहु आयामी कवि थे इसीलिए उन्होंने कई नई विधाओं एवं शैलियों मैं रचना की, और यदि इसी श्रंखला में हास्य एवं व्यंग की शैली को देखें तो अमीर खुसरो की तरह भारतेंदु भी मुकरियों में सामाजिक एवं राष्ट्रीय जागरण को हास्य व्यंग के साथ प्रस्तुत करते हैं, वे लिखते हैं-
"भीतर भीतर सब रस चूसै
हंसि-हंसि कै तन-मन-धन मूसै
जाहिर बातन में अति तेज,
क्यों सखि सज्जन नहिं अंगरेज॥"
इसी प्रकार भारतेंदु शराब के विषय में भी लोगों को जागरूक करते हुए लिखते हैं-
"मुँह जब लागै तब नहिं छूटै,
जाति-मान-धन सब कुछ लूटै।
पागल करि मोहिं करे खराब,
क्यों सखि सज्जन नहिं सराब।"
भारतेंदु हरिश्चंद्र को वैसे तो भारतेंदु युग का प्रवर्तक कवि माना जाता है और जो आदर्श साहित्य के लिए भारतेंदु ने निर्धारित किए उनका ही अनुसरण भारतेंदु मंडल ने किया इसीलिए चाहे रचना किसी भी विधा की हो उनमें राष्ट्रीय एवं सामाजिक चेतना उत्कर्ष में ही रही है, और साथ ही साथ भारतेंदु का बहुआयामी व्यक्तित्व भी हमें उनकी रचनाओं से दृष्टिगोचर होता है जिसकी प्रेरणा पाकर संपूर्ण भारतेंदु युग के साहित्यकारों ने काव्य सृजन किया अंततः यह कहने में कोई संकोच नहीं कि भारतेंदु युग सदैव ही हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय एवं सामाजिक नवजागरण का शिखर बिंदु माना जाएगा।

Post a Comment