मिट्टी की खुशबू का कवि, निलोत्पल मृणाल

 लेखक - सोनू


"ऐ कवि! कविता नहीं आज के समय की चिंता लिखो।" इस तरह की पंक्ति लिखने वाला निलोत्पल मृणाल न सिर्फ यह कहता है बल्कि अपनी कविताओं के माध्यम से इस को चरितार्थ भी करता है। वह अपनी कविताओं में उस किसान, उस मजदूर, उस दलित, शोषित, वंचित व्यक्ति को रखता है जिसके सरोकार मुख्यधारा में जुड़ने की प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं। निलोत्पल ने न सिर्फ कविताएं रची बल्कि कई उपन्यास भी लिखे जैसे डार्क हॉर्स, यार जादूगर और घर उल्लेखनीय है।


डार्क हॉर्स जैसे उपन्यास के द्वारा ही निलोत्पल ने वह प्रसिद्धि पाई की एक संघ लोक सेवा परीक्षा की तैयारी करने वाला छात्र हिंदी का बेस्ट सैलर बन गया। यूं तो उनके बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है किंतु आइए हम उनके मिट्टी से जुड़ने की इस प्रक्रिया को जानने का प्रयास करते हैं, आज हम उन की कविता 'हम मिट्टी के लोग हैं बाबू!' पर चर्चा करते हैं। इस कविता की आरंभिक पंक्तियां ही यह बतला देती हैं कि निलोत्पल किस तरह अपनी जड़ों को पकड़े हुए हैं, न सिर्फ अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं बल्कि अपनी कविता की आरंभिक पंक्तियों से ही सभी को आवाहन करते हैं कि सभी अपनी जड़ों से निरंतर जुड़े रहे।

आरंभिक पंक्तियां हैं,

"हम मिट्टी के लोग हैं बाबु! 
मिट्टी ही सदा उड़ायेंगे, 
मिट्टी में सने, मिट्टी के बने फिर मिट्टी ही में मिल जाएंगे।"


यह पंक्तियां स्पष्ट रूप से बता देती हैं कि निलोत्पल उन किसानों की बात करते हैं जिनसे भारत का निर्माण होता है, वे सीमेंट क्नक्रीत से बने भारत की बात नहीं करते क्योंकि उनसे सोंधी मिट्टी वाला हिंदुस्तान नजर नहीं आता।

उनकी पंक्तियां जीवन की समग्रता को लिए हुए हैं  उनका यह कथन कि गांव का होना और गांव में होना दो भिन्न-भिन्न बातें हैं, उनकी कविताओं के मर्म को स्पष्ट रूप से हमारे समक्ष प्रस्तुत कर देता है।

"जब आग लगेगी दुनिया में, 
दे मिट्टी उसे बुझायेंगे, 
जब भूख से दुनिया तड़पेगी, 
मिट्टी में फ़सल उगाएंगे।"


उपरोक्त पंक्ति के माध्यम से निलोत्पल ने मिट्टी के महत्व को एक आम आदमी को समझाने का प्रयास किया है। धार्मिक कट्टरपंथ के इस दौर में वे मिट्टी से आग बुझाने की बात करते हैं इसको पाठक अलग-अलग संदर्भों में समझ सकते हैं, साथ ही वे उस किसान की बात करते हैं जो आज से 100 साल पहले था कमोबेश उसी स्थिति में आज भी अपना जीवन बसर कर रहा है।

मिट्टी के महत्व को इस हद तक रेखांकित करते हैं निलोत्पल की सौंधी मिट्टी की खुशबू इस कविता को पढ़ते ही प्राप्त हो सकती है। "इस मिट्टी से कोडेंगे सोना, माथे का मुकुट बनायेंगे।" इस तरह की निलोत्पल की पंक्तियां ग्रामीण भारत के समृद्ध शैली परंपरा का उल्लेख करती दिखाई पड़ती हैं, उनकी आशावादिता उच्च कोटि की दिखलाई पड़ती है। अत्याधुनिकता के दौर में मिट्टी की बात करके वे संतुलन स्थापित करने का प्रयत्न करते दिखाई पड़ते हैं।

नीलोत्पल आम आदमी के दुख दर्द को बताते हुए कहते भी हैं कि आम आदमी आम क्यों हैं? क्योंकि आम जब बहुत छोटा होता है तो उसे ढेला मार कर चटनी बना ली जाती है, बड़ा होने पर व्यवस्था द्वारा उसका अचार बना दिया जाता है तथा पकने पर सिस्टम द्वारा चूस लिया जाता है। इसी आम आदमी के मुद्दे निलोत्पल अपनी कविताओं में भलीभांति उठाते रहे हैं। इसकी झलके उनकी निम्न पंक्तियों से प्राप्त होती है,

"जब कोई घर जो अंधेरा देखेंगे, 
मिट्टी के दिए से भर देंगे। 
चौखट पर रखी तलवारों को, 
पिघला कर मिट्टी कर देंगे। 
उसी मिट्टी से लिपेंगे आंगन, 
मिट्टी के कलश बनाएंगे। 
मिट्टी में सने, मिट्टी के बने फिर मिट्टी के हो जाएंगे।"


उपरोक्त पंक्तियों के द्वारा निलोत्पल के सुविचार हमारे समक्ष प्रस्तुत हो जाते हैं, जहां एक और वह घर घर मिट्टी के द्वारा प्रकाश फैलाने की बात करता है वहीं दूसरी ओर अहिंसा का संदेश बहुत ही अनोखे ढंग से समाज तक पहुंचाने का प्रयत्न करता दिखाई पड़ता है। इस प्रकाश को प्रकारांतर में समझा जाए तो यह अज्ञानता पर ज्ञान का प्रकाश है, अपनी जड़ों को थाह में रखने का प्रकाश है और है इस चीज का भी प्रकाश जिससे शांति और समृद्धि स्थापित हो। उपरोक्त पंक्तियों के माध्यम से नीलोत्पल इन्हीं बातों की वकालत करते हैं।

तलवारों को पिघला कर मिट्टी कर देने वाली पंक्ति द्वारा अहिंसा का संदेश जनसामान्य तक भलीभांति पहुंचाने में नीलोत्पल सफल हुए हैं। इसी तरह उनकी अनेक कविताएं युवाओं और जनसामान्य के सरोकारों से संबंधित हैं। जहां एक ओर वे उस गरीब की चिंता लिखते हैं जो दो वक्त की रोटी के लिए दिनभर जद्दोजहद करता है तो वहीं दूसरी ओर उस बेरोजगार छात्र की भी पीड़ा लिखते हैं जो अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर रहकर अपनी तपस्या करके सफलता पाना चाहता है। उस पीड़ा, उस संघर्ष को निलोत्पल ने अपनी कविता में बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।

समग्र और सारगर्भित रूप में कहा जा सकता है कि निलोत्पल की कविताओं का केंद्र बिंदु किसी वर्ग विशेष का बनकर नहीं रह गया है। कमोबेश उन्होंने हर उस मुद्दे को छूने का प्रयास किया है जिससे आम आदमी के सरोकार होते हैं। समकालीन हिंदी साहित्य में निलोत्पल ने अपनी पहचान नए रूप में बनाई है। अंत में राजेश रेड्डी की यह पंक्तियां निलोत्पल के लिए यथोचित दिखलाई पड़तीं हैं की,

"ये कब चाहा कि मैं मशहूर हो जाऊं,
बस अपने आपको मंजूर हो जाऊं।"


नीलोत्पल जी के ऑफिशियल यूट्यूब चैनल पर जाकर यह पूरी रचना सुने 

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