संस्कृत साहित्य, राष्ट्रीय चेतना का साहित्य
लेखक - राहुल मौर्य
संस्कृत साहित्य पर एक नजर
विश्वस्तरीय साहित्य को एक नया रूप देने में भारतीय साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका रही है फिर चाहे वो भाव की दृष्टि से देखा जाए या फिर कला की दृष्टि से इसी भारतीय साहित्य का मूल स्वरूप हमें संस्कृत साहित्य में देखने को मिलता है जहां एक तरफ संस्कृत साहित्य ने विषय वस्तु की व्यापकता दिखाई तो वहीं दूसरी तरफ भाव एवं शिल्प पक्ष की दृष्टि से भी उत्कृष्ट रहा, इस बात में तो कोई दो राय नहीं की जो साहित्यिक मापदंड संस्कृत साहित्य ने निर्धारित किए उसका अनुसरण आज पूरा विश्व अलग-अलग पद्धति में कर रहा है।
यदि हम विषय वस्तु की व्यापकता पर बात करें तो जहां एक तरफ संस्कृत साहित्य ने आधुनिक समाज के सारे विमर्श, विज्ञान के समस्त आयाम, प्राकृतिक रहस्य, चिकित्सा की भिन्न-भिन्न पद्धतियां, जीवो के संदर्भ में सूक्ष्म विश्लेषण इत्यादि विषयों को समेटा तो वहीं दूसरी तरफ अध्यात्म, दर्शन, ईश्वर और आत्मा का संबंध जैसे कई विषयों पर गंभीर चिंतन करके समाज को नई दिशा दी।
संस्कृत साहित्य की विशेषता-:
वैसे तो संस्कृत साहित्य की विशेषताएं अनंत हो सकती हैं क्योंकि संस्कृत साहित्य से ही समस्त सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक ज्ञान जन्म लेता है, फिर भी आइए हम कुछ विशेषताओं पर बात करते हैं-:
1. संस्कृत भाषा समस्त आधुनिक भाषाओं की जननी है अतः जो मूल सिद्धांत व्याकरणिक दृष्टि से संस्कृत ने निर्धारित किए हैं उसी का अनुसरण समस्त आधुनिक भाषाएं एवं उनका साहित्य करती हैं।
2. वैदिक संस्कृत साहित्य को कई विद्वानों ने जीवन का मूल ग्रंथ बताया है एवं समस्त धार्मिक, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक ग्रंथ आदि इसी वैदिक साहित्य की उपज हैं।
3. यज्ञ संस्था के रूप में संस्कृत साहित्य ने विशेष भूमिका का निर्वाह किया है।
4. महान पश्चात दार्शनिकों जैसे अरस्तु, प्लाटों आदि विद्वानों ने भी उपनिषदों की प्रधानता को न केवल स्वीकार किया बल्कि इन ग्रंथों का अनुसरण कर के कई दार्शनिक सिद्धांत दिए।
5. आज के साहित्यिक शिल्प को तात्कालिक स्वरूप देने में संस्कृत साहित्य ने विशेष योगदान दिया है, इसी के साथ-साथ कई आधुनिक विधाओं का जनक भी संस्कृत साहित्य ही है।
6. शिष्टाचार, नैतिकता आचरण इत्यादि कई व्यवहारिक विषयों पर व्यापक चिंतन भी हमें संस्कृत साहित्य में देखने को मिलता है।
संस्कृत साहित्य में राष्ट्रपरक चिंतन-:
"।।राजते दीप्यते प्रकाशते शोभते इति राष्ट्रम्।। "
वैसे तो राष्ट्र के संदर्भ में भिन्न-भिन्न विद्वानों के भिन्न-भिन्न मत रहे हैं जहां एक तरफ पश्चिमी सभ्यता भाषा, धर्म एवं भौगोलिक स्थिति को आधार मानकर राष्ट्र का निर्धारण करती है तो वहीं दूसरी तरफ भारतीय सभ्यता सांस्कृतिक एकता को आधार मानकर राष्ट्र का निर्धारण करती है, जहां तक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की बात है तो फ्रेंच रिवॉल्यूशन से ही राष्ट्रवाद का उदय माना जाता है परंतु भारतीय परिपेक्ष में राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रपरक चिंतन हमें पौराणिक काल से ही मिल जाता है।
यदि हम राष्ट्र शब्द की उत्पत्ति के संदर्भ में बात करें तो राज धातु में 'ष्ट्रन्' प्रत्यय जोड़ने से राष्ट्र शब्द निर्मित होता है जिसका अर्थ चमकने के संदर्भ में लिया जा सकता है अब यदि हम राष्ट्र को परिभाषित करें तो हम ये कह सकते हैं कि जो स्वयं देदीप्यमान होने वाला है। वह राष्ट्र कहलाता हैं, अथवा विविध वैभवौ से सुशोभित देश "राष्ट्र" कहलाता हैं।
पौराणिक एवं वैदिक संस्कृत साहित्य में राष्ट्रवाद-
वैदिक साहित्य में राष्ट्र के व्यापक एवं विस्तृत चिंतन के साक्ष्य प्राप्त होते हैं जहां एक तरफ राष्ट्र को मातृभूमि कहा गया है तो वहीं दूसरी तरफ राष्ट्र को सर्व समृद्धि देने वाला बताया गया है, माता के रूप में पृथ्वी को पूजने का विशेष महत्व भी हमें हमारे वैदिक ग्रंथों में मिलता है।
'द्यौर्मे पिता जनिता नाभिरत्र बन्धुर्मे माता पृथिवी महीयम्'
ऋग्वेद में उल्लेखित इस श्लोक में पृथ्वी को माता एवं आकाश को पिता की संज्ञा दी गई है, यदि हम इस श्लोक की गंभीरता को समझें तो हमें यह ज्ञात होगा कि संपूर्ण पृथ्वी को एक राष्ट्र की तरह देखने का प्रयास कहीं ना कहीं हमारे वैदिक ऋषियों ने किया है। ऋग्वेद के साथ ही साथ अथर्ववेद में भी पृथ्वी को माता के समान देखा गया है उदाहरण स्वरूप यह श्लोक देखिए-
'माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः'
इसी प्रकार हम कुछ और श्लोक देख सकते हैं जिनमें पृथ्वी को माता के समान देखा एवं पूजा गया है-
' भूमे मतर्निधेहि मा भद्रया सुप्रतिष्ठितम ।'
( अथर्ववेद 12-13-3 )
'सा नो भूमिस्त्विर्षि बलं राष्ट्रे दघतूत्तमे ।'
( अथर्व . 12-8 )
वेद विश्व के सबसे प्राचीनतम ग्रंथों में से एक हैं इसीलिए लगभग सभी विद्वानों ने वेद ग्रंथों को मूल एवं प्रमाणिक सत्य के रूप में देखा है, वेदों में राष्ट्र शब्द कई संदर्भों में प्रयोग किया गया जैसे राष्ट्रकामः, अभिराष्ट्रः, राष्ट्रदाः, राष्ट्रदिप्सवः, राष्ट्रभृतः, राष्ट्रगोपः, राष्ट्री आदि परंतु यदि हम वैदिक ग्रंथों मैं राष्ट्र शब्द के मूल अर्थ को देखने का प्रयास करते हैं तो ऋग्वेदसंहिता में ' राष्ट्रं क्षत्रियस्य ' , ' राजा राष्ट्रानाम् ', ' राष्ट्रं गुपितं क्षत्रियस्य " आदि सन्दर्भो से ज्ञात होता है कि क्षत्रिय के द्वारा शासित भूभाग को राष्ट्र कहते हैं। वैदिक ग्रंथों की यह विशेषता रही है कि इन ग्रंथों में राष्ट्र एवं राष्ट्रीयता या अन्य सभी विषयों पर व्यापक चिंतन मिलता है जोकि किसी अन्य ग्रंथ से प्राप्त करना निश्चित ही कठिन है, वैदिक वांग्मय में न केवल राष्ट्र के संदर्भ में उसके अर्थ एवं मूल स्वरूप का वर्णन मिलता है बल्कि इसके अतिरिक्त वेदों में राष्ट्र की उन्नति एवं प्रगति से संबंधित प्रार्थनाएं एवं वंदना मिलती हैं, उदाहरण स्वरूप यह श्लोक देखिए-
'ओजस्वती स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा ।'
(यजुर्वेद 10.3)
यहां वैदिक ऋषि ईश्वर से ओजस्वी राष्ट्र की कामना करते हैं, इसी प्रकार हमें कई श्लोक यजुर्वेद से प्राप्त होते हैं जिनमें वैदिक ऋषि राष्ट्र की समृद्धि एवं उसकी उन्नति की कामना करते हैं -
'अर्थेत स्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा ।'
(यजुर्वेद-10.3)
राष्ट्र की समृद्धि एवं उन्नति की कामना करते हुए वैदिक ऋषि जहां एक तरफ अर्थ को महत्वपूर्ण दिखाते हैं तो वहीं दूसरी तरफ राष्ट्र में दांपत्य जीवन का पालन करने वाले लोगों के उन्नति से राष्ट्र की उन्नति को जोड़कर देखते हैं -
'अभीवर्धाताम् व्यसाधिक राष्ट्रेन् वर्धताम् ।।'
किसी भी राष्ट्र की उन्नति के लिए उस राष्ट्र का प्राकृतिक संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण होना आवश्यक है, अतः 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की संकल्पना को साकार करते हुए वैदिक ऋषि पृथ्वी को राष्ट्र मानते हुए पृथ्वी द्वारा उपजे वनस्पतियों एवं लाभकारी औषधियों इत्यादि पौधों का गुणगान एवं उनके समृद्धि की कामना करते हैं उदाहरण स्वरुप यह श्लोक -
'असम्बाधं मध्यतो मानवानां यस्या उद्वत: प्रवतः समं
बहु ।
नानावीर्या ओषधीर्या बिभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः।। '
(अथर्ववेद 12.1.2 )
(पृथ्वी सूक्त)
वेदों के साथ-साथ ब्राह्मण ग्रंथों में भी हमें राष्ट्र के भिन्न-भिन्न स्वरूपों की व्याख्याएं एवं उनकी विस्तृत विवेचना के प्रमाण प्राप्त होते हैं जैसे शतपथब्राह्मण में राष्ट्रं मुष्टिः। इसी प्रकार ऐतरेयब्राह्मण में राष्ट्राणि वै विशः। और क्षत्रं हि राष्ट्रम् ।, जैमिनीय ब्राह्मण में श्रीवै राष्ट्रम्। , तैत्तिरीय ब्राह्मण में श्रीर्वै राष्ट्रस्य मध्यम्। इत्यादि हम कई संदर्भ देख सकते हैं।
पौराणिक संस्कृत साहित्य में कई स्थानों पर राष्ट्र के स्थान पर भारत एवं भारत भूमि शब्द का प्रयोग भी मिलता है जो कि भारत के महानता एवं संप्रभुता को दर्शाता है उदाहरण स्वरूप विष्णु पुराण में भारत की भौगोलिक स्थिति के संदर्भ में यह श्लोक-
'उत्तरं यत्समुद्र्स्य, हिमाद्रैश्चैव दक्षिणम्,
वर्षं तद् भारतम् नाम, भारती तत्र संततिः।।'
इसी के साथ ही साथ रामायण में भी एक प्रसंग हमें ऐसा मिलता है जहां भगवान श्रीराम भारत और स्वर्ग की तुलना करते हुए भारत को श्रेष्ठ बताते हैं-
‘नेयं स्वर्णमयी लंका, न मे रोचते लक्ष्मण।
जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।’
भारतवर्ष की महानता को और स्पष्ट रूप से देखने के लिए यह श्लोक देखिए जिसमें देवताओं को भी भारत भूमि में जन्म हेतु ललाहित बताया गया है-
गायन्ति देवा: किल गीतिकानि
धन्यास्तु ते भारतभूमि भागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते
भवन्ति भूय: पुरुषा: सुरत्वात्।।
_विष्णुपुराण २.४.२४
राष्ट्र पर चिंतन करते हुए भारतीय विचारको एवं ऋषियों ने यह भी माना कि राष्ट्र के वैभवशाली भविष्य के लिए यह आवश्यक है कि उस राष्ट्र में रहने वाले लोग या फिर हम व्यापक अर्थ में कहें तो संपूर्ण मानव जाति आपस में सहचर्य एवं पारस्परिक तालमेल की भावना को उत्कर्ष पर रखे जिससे सकारात्मक मतभेद होने के बाद भी मनभेद ना हो, उदाहरण यह श्लोक देखिए-
'समानो मन्त्र: समिति: समानी समानं मन:
सहचित्तमेषाम् ।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये व: समानेन वो हविषा
जुहोमि।। '
(ऋग्वेद 10.191)
(संगठन सूक्त),
इसी क्रम में हमारे वैदिक ऋषि समस्त मानवजाति के संदर्भ में प्रार्थना करते हुए हमारे लक्ष्य, ह्रदय के भाव एवं चिंतन पद्धति के एक समान रहने की बात करते हैं ताकि समस्त मानवजाति समृद्धि एवं संगठित रह सके।
'समानी वः अकूतीः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।।'
(ऋग्वेद 10.191)
(संगठन सूक्त)
भारतीय चिंतन कि सुदीर्घ परंपरा सदैव ही समस्त मानव जाति के कल्याण की भावना रखती चली आई है और इस भाव के प्रमाण हमें लौकिक एवं वैदिक दोनों ही साहित्य में मिलते हैं और शायद इसीलिए हमारे वैदिक ऋषि समस्त पृथ्वी वासियों के हित में कामना करते हैं ना की किसी संकीर्ण भूभाग की।
'सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।'
- वृहदारण्यक उपनिषद्
विश्व कल्याण की भावना ही भारतीयता का उत्कर्ष बिंदु है और इस उत्कृष्ट उत्कर्ष की छवि हमें समस्त भारतीय ग्रंथों में दिखती है इस बात में तो कोई दो राय नहीं कि पौराणिक काल में भारत विश्व गुरु अपने इसी चिंतन पद्धति के बदौलत बन पाया।
यदि हम राष्ट्र के संदर्भ में उपनिषदों को भी देखें तो हमें उपनिषदों में भी समाज हित की भावना एवं राष्ट्र धर्म की सर्वोच्चता दिखती है,
'इदं राष्ट्राय इदं न मम।'
अर्थात हमारे द्वारा अर्जित समस्त भौतिक एवं आध्यात्मिक संपदा राष्ट्र के मंगल एवं कल्याण हेतु है, इसी के साथ हमें कठोपनिषद के इस महावाक्य को भी नहीं भूलना चाहिए जिसमें ऋषियों ने मानवों के अज्ञान मुक्ति एवं समृद्धि के मार्ग को प्रशस्त किया है-
'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत'
स्वामी विवेकानंद द्वारा युवाओं को प्रेरित करने वाला महावाक्य "उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति होने तक मत रुको।" भी इसी श्लोक से लिया गया है, राष्ट्रीयता की इसी श्रृंखला में हमें कई पौराणिक ग्रंथ मिलते हैं जिनमें राष्ट्र को सर्वोच्च स्थान दिया गया है उदाहरण स्वरूप जहां एक तरफ मनुस्मृति में राष्ट्र की प्रधानता दिखती है तो वहीं दूसरी तरफ शुक्र नीति एवं अर्थशास्त्र जैसे महान ग्रंथों में राष्ट्र एवं उसके तत्व की विस्तृत समीक्षा प्राप्त होती है अतः इस विस्तृत अध्ययन के बाद हम यह कह सकते हैं हमारे वैदिक साहित्य एवं लौकिक साहित्य में राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीयता की भावना सदैव ही शिखर पर रखी गई है।
आधुनिक संस्कृत साहित्य में राष्ट्रवाद-
आधुनिक संस्कृत साहित्य में राष्ट्रीयता की भावना का होना स्वभाविक ही था क्योंकि ये वह दौर था जब अंग्रेजी शासन भारतीय संस्कृति एवं भारतीयता का अपने पूरे दमखम के साथ दमन कर रही थी ऐसी अवस्था में भारतीय जनमानस में राष्ट्रीयता की भावना का पुनर्जागरण समाज सुधारकों एवं भारतीय साहित्यकारों ने ही किया, एक तरफ जहां स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और राजा राममोहन राय जैसे विचारक एवं समाज सुधारक अपना कार्य कर रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ भारतीय साहित्यकार जैसे श्री पं. अबिकादत्त व्यास , पं. क्षमाराव , श्री मथुरा प्रसाद दीक्षित , आचार्य चारुदेव शास्त्री आदि अनेक विद्वान राष्ट्रचेतना के प्रचार एवं विस्तार में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे थे।
कहते हैं कि परिस्थिति अविष्कार की जननी है हम इस कहावत को भी आधुनिक राष्ट्रीयता से जोड़ कर देख सकते हैं जहां जन-जन में अंग्रेजी सत्ता के प्रति आक्रोश प्रबल हो रहा था तो वहीं उनके भीतर स्थित राष्ट्रीयता का स्वर भी प्रखर हुआ और इसी राष्ट्रीयता के स्वर को स्थिर गति भारतीय साहित्यकारों ने प्रदान की, आइए हम आधुनिक संस्कृत साहित्य की भूमिका को राष्ट्रीयता के संदर्भ में समझे।
आधुनिक संस्कृत साहित्य में पण्डित अम्बिकादत्त व्यास द्वारा विरचित ‘शिवराज विजय’ संस्कृत का गौरवपूर्ण उपन्यास माना जाता है। मुख्यतः इसमें छत्रपति शिवाजी के जीवन की गौरवमयी पृष्ठभूमि का वर्णन किया गया है जिसमें उनके संघर्ष एवं राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना प्रबल रूप से दिखाई गई है, इस उपन्यास में ना केवल शिवाजी बल्कि उनके वीर मंत्री गण एवं साथियों का भी वर्णन मिलता है इस उपन्यास में कर्म के प्रति प्रेरणा देते हुए कवि ने महत्वपूर्ण संदेश दिया है-
"कार्यं वा साधयेयम् देहं वा पातयेयम्'
उपरोक्त संस्कृत वाक्य में हम कवि की राष्ट्रीय चेतना को अपने उच्चतम शिखर पर देख सकते हैं जहां वे कार्य की सिद्धि के आगे प्राणों का महत्व भी कम आंकते हैं इसी प्रकार के कई उद्धरण हमें इस उपन्यास से प्राप्त होते हैं जहां राष्ट्रीयता एवं जनकल्याण की भावना प्रखर है। वैसे तो पंडित अंबिकादत्त व्यास जी ने कई रचनाएं लिखी जिनका भारतीय साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है परंतु जो स्थान 'शिवराज विजय' उपन्यास का है वो शायद ही किसी और का होगा।
राष्ट्रीयता की इसी श्रंखला में अगला नाम पंडिता क्षमा राव जी का आता है, कहते हैं क्षमा राव जी ने 50 से भी अधिक रचनाएं की हैं परंतु इन सभी रचनाओं में 'सत्याग्रह गीता' इनकी क्रांतिकारी रचना है इस रचना में मुख्यता महात्मा गांधी जी के जीवन, उनके मूल्यों अथवा उनमें निहित राष्ट्रीयता की भावना को अत्यंत प्रभावी ढंग से उजागर किया गया है। उदाहरण स्वरूप हम कुछ पंक्तियां देख सकते हैं जहां पर कवित्री ने राष्ट्रीयता की भावना एवं जन समुदाय में बंधुत्व एवं पारस्परिक तालमेल पर जोर दिया है-
' सत्यं विजयतां लोके मुक्तं भवतु भारतम् ।
नन्दन्तु सुखिनः सर्वे देशजा : च विदेशजाः ।। ,
कहते हैं कि पंडिता क्षमा राव जी महात्मा गांधी से बहुत प्रभावित थीं इसलिए उन्होंने सदैव ही अपनी लेखनी भारतीयता एवं राष्ट्रीयता के पक्ष में ही चलाई, स्वतंत्रता को लेकर क्षमा राव जी के बड़े खुले विचार थे उन्होंने यह माना कि बंधन में रहने से अधिक श्रेष्ठ मृत्यु है और उनके यह विचार हमें उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई भी पढ़ते हैं।
जहां एक तरफ पंडिता क्षमाराव जी राष्ट्रीयता की अलक जगा रहीं थीं तो वहीं दूसरी तरफ मथुरा प्रसाद दीक्षित जी ने कई ऐतिहासिक, राष्ट्रीय एंव सांस्कृतिक रूपकों को लेकर संस्कृत नाट्य परंपरा को समृद्ध किया। स्वाधीनता संग्राम के उस दौर में अधिकतर साहित्यकार फिर चाहे वे हिंदी साहित्य के हो या फिर संस्कृत साहित्य के वे सभी महात्मा गांधी से अत्यधिक प्रभावित थे, अतः इसी श्रंखला में मथुरा प्रसाद जी ने भी कई नाटक महात्मा गांधी एवं उनके आदर्शों को मूल में रखकर लिखा।
'वीर प्रताप नाटकम्', 'भारतविजय नाटकम्' और 'गांधिविजय नाटकम्' मथुरा प्रसाद जी के स्तुत्य नाटकों में से एक है, इन नाटकों में लेखक ने गांधीजी के मूल्यों एवं उनके आदर्शों को केंद्र में रखकर राष्ट्र की एकता पर जोर दिया है साथ ही साथ इनके नाटकों ने नव युवकों को राष्ट्र के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित भी किया है।
नाटककार श्री मथुरा प्रसाद जी के कुछ अन्य नाटक भी बहुत महत्वपूर्ण नाटकों में से एक है जैसे वीरपृथ्वीराज, शंकरविजय, भक्तसुदर्शन, भूभारोद्धरणम् आदि यह सभी वैसे तो ऐतिहासिक नाटकों की सूची में आते हैं परंतु इनमें भी राष्ट्रीयता की भावना प्रबल रूप से दिखती है. नाटककार ने अपने इन नाटकों में सामाजिक समस्याओं एवं विषमताओं को ऐतिहासिक रूपकों के माध्यम से प्रस्तुत किया है अतः हम यह कह सकते हैं कि सामाजिक जागरण एवं राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में मथुरा प्रसाद दीक्षित जी का अतुलनीय योगदान रहा है।
राष्ट्रीय आंदोलनों में गांधी जी का प्रमुख स्थान रहा है और यदि हम किसी एक ग्रंथ की बात करें जिसने महात्मा गांधी जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को एक जगह संग्रहित कर के पाठकों के आगे प्रस्तुत किया तो इस सूची में सबसे पहला नाम श्री चारु देव शास्त्री जी की रचना 'गान्धीचरितम्' का आएगा, यह संपूर्ण रचना अत्यंत प्रशस्त और प्रांजल गद्य में है इसमें छह अध्यायों में गाँधी के जन्म से लेकर सत्याग्रह आंदोलन के आरंभ तक की घटनाएँ यथार्थ की मीमांसा के साथ निरूपित हैं।
गांधी विचारशील व्यक्ति थे अतः उन्होंने अपने सभी फैसलों में राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को प्रमुख स्थान दिया और उनकी इसी विचारशीलता को हम गान्धीचरितम् ग्रंथ में भी देख सकते हैं। वैसे तो चारूदेव शास्त्री ने संस्कृत व्याकरण के नियमों पर कई ग्रंथों की रचना की है परंतु इसके अतिरिक्त उनकी एकमात्र रचना गांधीचरितम् उनके अंदर की राष्ट्रीयता को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर देती है, और कहीं ना कहीं यही राष्ट्रीयता पाठकों में राष्ट्रीय चेतना एवं राष्ट्रवाद को जागृत अवस्था में भी ला देती है।
निष्कर्ष-:
उपरोक्त सभी उदाहरणों के अध्ययन पश्चात हम यह कह सकते हैं कि राष्ट्रीयता संस्कृत साहित्य के मूल में रही है फिर चाहे वह वैदिक काल को देखा जाए या फिर आधुनिक काल को। जिस राष्ट्रीयता का आरंभ ज्यादातर विद्वान पश्चिमी क्रांतियों से मानते हैं उसका मूल हमें पूर्ण रूप से हमारे संस्कृत साहित्य में ना केवल मिलता है बल्कि उस पर गहन चिंतन एवं व्यापक विमर्श की धारा भी दृष्टिगोचर होती है। यदि हम एक शब्द में भारतीय राष्ट्रीयता के मूल तत्व की व्याख्या करें तो हम यह कह सकते हैं कि विश्व कल्याण एवं विश्व समृद्धि ही भारतीय राष्ट्रीयता का मूल भाव है, इस विश्व समृद्धि एवं कल्याण में न केवल मानव बल्कि प्राकृतिक संसाधनों, जीव-जंतु एवं समस्त वनस्पतियों इत्यादि के प्रति भी एक समान भाव मिलता है, इन सभी संदर्भों को ध्यान में रखकर यह कहने में कोई संदेह नहीं कि जितनी व्यापकता राष्ट्रीयता को लेकर भारतीय संस्कृत साहित्य में है उतनी व्यापकता किसी अन्य साहित्य में देख पाना दुर्लभ है।

Post a Comment