आँखों के आगे की दुनिया

लेखक - विशाल सैनी


आँखें किसी का ख्वाब हैं तो किसी का जवाब हैं, ये कभी खुशी बयाँ करती हैं तो कभी गम। आँखें मनुष्यों की सभी इंद्रियों में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं, ये  दुनिया की खूबसूरती, अच्छाई-बुराई दर्शाती हैं। आँखें आमतौर पर व्यक्ति के स्वभाव और व्यक्तित्व के बारे में बताती हैं। आंखों का रंग, आँखों की हरकत और आंखों के आंसू बहुत कुछ कहते हैं आंखों को पढ़ना जान लें तो सामने वाले के मन को भी जान सकते हैं। प्रेम और संबंधों के मामले में आँखों की भाषा जान लेने से बिना कुछ कहे हमें उत्तर मिल सकता है।


आँखें तो कुदरत ने सभी प्राणियों को दी हैं, लेकिन मनुष्य में इसका अलग ही महत्व है। शरीर की खूबसूरती में भी ये सहायक हैं। साहित्यकारों और कवियों ने तो अपनी रचनाओं, कविताओं और गजलों में उपमाएँ देकर आँखों का उल्लेख किया है। न जाने कितने ही गीत, कितनी ही कविताएँ सिर्फ आँखों पर बनी हैं। यहाँ तक की कई मुहावरे भी आँखों पर बने हैं। आँखें केवल देखने का काम नहीं करती बल्कि ये एक ज्ञानेंद्री के रूप में भी कार्य करती हैं।

आँख का मन से भी गहरा रिश्ता है, मन का सरोकार यद्यपि समस्‍त इंद्रियों के साथ है पर नेत्र के साथ तो उसका सबसे अधिक घनिष्ठ संबंध है, किसी बुद्धिमान का सिद्धांत है कि अकिलमंदों का मन आँख में रहता है। दार्शनिक यह शब्‍द ही दृश धातु से बना है अर्थात् वह मनुष्‍य जो किसी वस्‍तु को देख उन पर अपनी मानसिक शक्ति को जोर दे। हम सब लोग दिन-रात हर एक वस्‍तु संसार की देखा ही करते हैं पर उन देखी हुई चीजों पर मन को कभी जोर नहीं देते, वही बुद्धिमान जन हैं जो 'कहना चाहिये देखना जिनको ही आता है' उनके नेत्र उस देखे हुए पदार्थ के नस-नस में प्रवेश कर उस पर मन को काम में लाकर सोचते-सोचते उसके तत्त्‍व तक पहुँच जाते हैं।

लटकती हुई चीजों को मामूली तौर पर झूलते हुए सब लोग रोज देखा करते हैं, लटकते हुए लैंप को इस प्रकार हवा में झोंका खाते देखा तो गैलेलियो के मन में यह एक अनोखी बात बोध हुई और इस बात को देर तक सोचने के बाद उन्‍होंने निश्‍चय किया कि इस तरकीब से हम समय को अच्छी तरह नाप सकते हैं और यही घड़ी के पेंडुलम की ईजाद का मूल कारण हुआ। एक शिशु बालक को जब कि उसकी मानसिक शक्ति अत्यंत अल्‍प रहती है उस समय नेत्र ही ज्ञान-द्वार होता है और यही कारण है कि बालक हर एक साधारण सी साधारण वस्‍तु को भी बड़े चाव और अचरज के साथ ग्रहण करता है तात्‍पर्य यह कि बालक की (मेंटल डेवलपमेंट) मानसिक शक्तियों का प्रकाश जैसा नेत्र के द्वारा देखने से होता है उतना सुनने आदि से नहीं।

किसी चटकीली चमत्‍कारी वस्‍तु को सुन जो मन में उत्‍सुकता या व्‍यग्रता पैदा होती है वह नेत्र ही के द्वारा शांत होती है। कभी किसी चीज को देखने से मन और अधिक उत्‍सुक होता जाता है जैसा प्रेमी को अपने प्रेम-पात्र के देखने में, सच्चे भक्त को अपने ईष्ट देव के दर्शन में। एक बार दो बार दस बार सहस्त्र बार जितना ही देखते जाइये देखने की अभिलाषा अधिक से अधिक होती रहेगी जैसा आग में घी छोड़ने से आग और धधकती है।

हालाँकि मनुष्य के जीवन में आँखों का बेहद महत्व है मगर, गहराई से विश्लेषण और विचार-विमर्श किया जाए तो आँखों से कहीं ज्यादा उजाले यानी प्रकाश का महत्व है, चूँकि घनघोर अंधेरे में तो हमारी आँखे  भी किसी काम की नहीं होती। रात के समय अकस्मात बिजली के चले जाने पर हुई असुविधा तथा मचने वाली खलबली से हम भलिभाँति परिचित हैं। अतः, यह कहना कि मानव के जीवन में आखें ही सब कुछ हैं तथा इसके बगैर जीवन असंभव है, नितांत अनुचित होगा।

इतिहास के पन्नों में ऐसे कअई महानुभावों का जिक्र मिलता है जिनहोंने बिना आँखों के ही न सिर्फ अपने जीवन में एक नया मुकाम हासिल किया बल्कि संघर्ष करते हुए समाज को एक बेहतर मार्ग प्रशस्त किया। लुई ब्रेल, हेलन केलर, सूरदास तथा रविंद्र जैन और जॉन मिल्टन जैसे आविष्कारक, लेखिका, साहित्यकार तथा संगीतकारों आदि का नाम इतिहास में शुमार है। लुई ने ब्रेल लिपि का आविष्कार कर दृष्टिबाधितों को नई आँखें दीं। एक ओर जहां दृष्टिबाधित होने, सुनाई न देने और यहाँ तक कि बोल ना पाने के बावजूद हार न मानते हुए हेलन केलर ने अपनी रचनाओं और महान विचारों के माध्यम से लोगों के अंदर सकारात्मक सोच विकसित करने में मदद की तथा उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया, वहीं दूसरी ओर सूरदास ने न सिर्फ भक्ति की नई मिसाल प्रस्तुत की बल्कि कई महान गीत और रचनाएँ गढ़कर हिंदी साहित्य और समस्त जगत में अमर हो गए। वहीं रविंद्र जैन ने अपनी प्रतिभा के दम पर भारतीय सिनेमा और फिल्म जगत में ऊँचा स्थान हासिल किया और रमायण तथा महाभारत जैसे लोकप्रीय धारावाहिकों में अपना संगीत भी दिया। वहीं जॉन मिल्टन ने आँखों की रोशनी गँवाने के बावजूद अपनी रचनाओं के बलबूते अंगरेजी के साहित्य में कभी न मिटने वाला स्थान हासिल किया।

मनुष्य के जीवन में यूँ तो आँखों और रोशनी की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता परंतु उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि केवल आँखें ही मनुष्य के जीवन का मार्ग और कल्याण प्रशस्त नहीं करती। आँखों का होना या न होना यह  हम पर निर्भर नहीं करता। पर मनुष्य स्वयं को नकारात्मकता और अज्ञानता के अँधेरे में रखना चाहता है या प्रकाश और ज्ञान के उजाले में यह उस पर ही निर्भर करता है। आँख के अभाव में भी कई लोग वो देख लेते हैं जो कुछ लोग आँखें होने के बावजूद नहीं देख सकते। आँख कुदरत का एक तोहफा जरूर है किंतु जिनको कुदरत ने इस तोहफे से नहीं नवाजा उन्हें कई अन्य तोहफे दिए हैं, जिनसे हम और सारा विश्व अपरिचित नहीं है।

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