पतन विचारों का है, कला का नहीं

 


क्या आप यह मानते हैं कि आज के युग में विज्ञान उन्नति पथ एवं कलाएं अवनति पथ पर अग्रसर हैं? यदि हां तो आप भी उन लोगों की तरह हैं जो संस्कृति पर होने वाले वज्रपात से घबराए हुए हैं, और शायद गहन चिंता में डूबे रहते होंगे कि अपनी महान कला और संस्कृति का संरक्षण कैसे करें तो मैं आपके इन प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करूंगा किंतु उससे पहले यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि हमने जितने खुले मन से यह स्वीकार कर लिया है कि संस्कृति एवं कला संकट में हैं हम उतने ही संकुचित विचारधारा व पूर्वाग्रहों के बंधन में बंधे हुए हैं। अपने इस कथन के आलोक में मैं कुछ तर्क प्रस्तुत करना चाहूंगा मुझे आशा है आप यह लेख पूरा पढ़ेंगे।

"ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्‌।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्‌ ॥"

मैं अपनी बात की शुरुआत ईशोपनिषद् के पहले मंत्र से करना समीचीन समझ रहा हूं, इस मंत्र में पहली पंक्ति का अंतिम अंश 'जगत्यां जगत्‌' अपने अंदर एक गहन बोध को समेटे हुए हैं, यह पद संसार की गतिशीलता की ओर संकेत कर रहा है जिसका तात्पर्य है परिवर्तन, जी हां वही परिवर्तन जिस पर डार्विन की एब्ल्यूशन थ्योरी, स्टीफन हॉकिंस कि बिग बैंग थ्योरी, इतिहास बोध और समाज की कई अवधारणाएं आधारित हैं। यह कहने में कोई हर्ज न होगा कि आज मनुष्य जिन भी उपलब्धियों को प्राप्त कर पाया है, एक लंबी परिवर्तनशील प्रक्रिया का परिणाम है।

परिवर्तन की यह प्रक्रिया जिसने संसार और समाज को गतिशीलता व नवीनता प्रदान की, दुर्भाग्यवश हमारे पूर्वाग्रहों का सामना कर रही है। न जाने क्यों जिस परिवर्तन प्रक्रिया के महत्व को हम विज्ञान और समाजशास्त्र के संदर्भ में स्वीकार कर चुके हैं, संस्कृति और कला के संदर्भ में समझने से तक कतराते हैं, और यह एक गंभीर चिंता का विषय है। आप विश्वास मानिए कला और संस्कृति के आलोक में परिवर्तन के महत्व को समझना न केवल बौद्धिक दक्षता अपितु वर्तमान के साथ तादात्म्य स्थापित होने का भी परिचायक है।

यहां विषय को और अधिक स्पष्ट करने के लिए हम कला कि इन तीन विधा साहित्य, संगीत और नृत्य पर चिंतन करेंगे, जैसा कि हम जानते हैं हिंदी साहित्य जगत् कि उत्कृष्ट उपलब्धियों में से एक बाबा तुलसीदास कृत श्री रामचरितमानस अनुपम और अद्भुत रचना है, किंतु अब आप यह कल्पना करें कि आज के युग में क्या कोई व्यक्ति श्री राम पर कोई महाकाव्य लिख सकता है? क्या समाज की प्राथमिकताएं किसी ऐसे महाकाव्य की अपेक्षा कर रहीं हैं? इन प्रश्नों पर बहुत विचार करने के बाद हमें उत्तर मिलता है नहीं, क्योंकि आज के दौर में न किसी मुगल आक्रांता से हमें ख़तरा है और न धार्मिक पंथ से अस्मिता का संकट। आज की परिस्थितियां गोस्वामी तुलसीदास जी के समय की परिस्थितियों से बिल्कुल भिन्न है, आज इस प्रौद्योगिकी के दौर में अभिव्यक्ति की आजादी, सूचना का अधिकार, निजता को लेकर संवेदनशीलता और अपार ज्ञानकोष की उपलब्धता हमारी प्राथमिकताएं बन चुकीं हैं, इसीलिए आप देख सकते हैं रिपोर्ट लेखन, लेख लेखन, निबंध लेखन, डायरी लेखन और यात्रा वृतांत जैसी कई नई साहित्यिक शैलियां विकसित हो रही हैं।

साहित्य की भांति ही संगीत में भी काफ़ि कुछ नयापन कई कारणों से आया है, इन कारणों में वक्त की जरूरत और संस्कृतियों का एकीकरण मुख्य कारण है, आज का संगीत मां मीरा की करुण वेदना नहीं गाता, आज का संगीत शास्त्रीयता की कठोर बेड़ियों में घुटना नहीं चाहता, आज का संगीत खुसरो, तानसेन, रफ़ी और लता के दामन से दुलार पाकर अब आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए समर्पित होना चाहता है, और यह शायद समर्पण ही है कि आज भारतीय संगीत में एंबिएंट, रॉक, पॉप, हिप हॉप, रैप इत्यादि नाना प्रकार की शैलियां शामिल हो चुकी हैं। समय की जरूरतों को देखते हुए आज के संगीत ने भी बाजार की ओर अपना रुख कर लिया है, और एक सुरीली तान लिए हुए इस सफ़र में आगे जा रहा है।

गायकी के नए ढंग, और वाद्य यंत्रों का नवीन संस्करण जितना आज के संगीत के लिए उपयोगी साबित हुए हैं उतना ही आधुनिक नृत्य शैलियों पर इनका उपकार है, एक समय हुआ करता था कि जब राज महलों में नृत्य करती हुई नर्तकी आम साधारण व्यक्ति के लिए जिज्ञासा का विषय रहती थीं, ऐसा इसलिए नहीं कि नर्तकी बहुत सुंदर हुआ करती थी बल्कि इसलिए कि आम व्यक्ति के लिए उस नर्तकी का नृत्य मनोरंजन हेतु उपलब्ध ही नहीं था, किंतु आज यह परिस्थितियां बदल चुकी हैं। जिस नृत्य के संदर्भ में कभी आचार्य भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में भंगिमाओं और मुद्राओं का उल्लेख किया था, वे अब परिवर्तित होकर नए स्वरूप को प्राप्त कर चुकी हैं। आज भारतवर्ष में शास्त्रीय व लोक नृत्यों के साथ साथ सालसा डांस, बैले डांस, जैज़ डांस, ब्रेक डांस, बेली डांस इत्यादि कई नवीन शैलियां अपना रंग बिखेर रहीं हैं।

उपरोक्त कलात्मक नवीनता इसलिए समाज का हिस्सा नहीं बनी कि पुरातन कला शैलियों से जन सामान्य उक्ता गया था, बल्कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि समय की कसौटी की दृष्टि से उनकी आवश्यकताएं समाप्त हो चुकी थी, वे सभी शैलियां परिपक्वता के उच्चतम शिखर तक जाकर सफलताओं को प्राप्त हो चुकी थीं और अब समाज पलकें बिछाए नई विधाओं का इंतजार कर रहा था। किंतु जब हम यह कहते हैं कि कलाओं का पतन हो रहा है, तब निश्चित ही हम नहीं देख पाते नवीनता और पुरातन के मध्य उस अंतर्संबंध को जिसे परिवर्तन कहा जाता है। हम नजरअंदाज कर देते हैं उस प्रक्रिया को जिसकी बदौलत हम वानरों से मनुष्य बन पाए हैं, हम नजरअंदाज कर देते हैं उस सिद्धांत को कि जिसने हमारा व्यवहार, व्यक्तित्व, विचारधारा और दर्शन तय किया है।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि नवीन कला शैलियों ने अपना नवीन स्वरूप इख्तियार कर लिया है, वे नए तेवर और भावबोध की विधाएं हैं और उनके मूल्यांकन के लिए नवीन प्रतिमान अत्यंत आवश्यक है अन्यथा न तो हम नवीन विधाओं के साथ न्याय कर पाएंगे और न तो पुरातन विधाओं के साथ, यदि हम हीं अपने वर्तमान का सम्मान नहीं कर सकते तो हमें कोई अधिकार नहीं कि आने वाली पीढ़ियों से यह अपेक्षा की जाए कि वे अपने इतिहास का सम्मान करेंगीं।

यहां अंतिम बात यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मेरा उद्देश्य किसी भी कलात्मक विधा को छोटा या बड़ा दिखाना नहीं अपितु यह दर्शाना है कि किसी नवीन विधा का उदय और किसी पुरातन विधा का अस्त होना विकासशील होने का परिचायक है, जो कि स्वतः घटित होने वाली स्वाभाविक घटना है।


लेखक - राहुल मौर्य

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