मन्नू का महाभोज, समकालीन राजनीति का जीवंत दस्तावेज

 लेखक - सोनू




महाभोज उपन्यास समकालीन राजनीति का जीवंत दस्तावेज महान लेखिका मन्नू भंडारी के महाभोज उपन्यास का प्रकाशन वर्ष 1982 माना जाता है। आलोचकों का यह मत है कि इस उपन्यास का केंद्रीय तत्व बिहार के बेलछी कांड पर आधारित है। जो 1977 में घटित हुआ, बेलछी कांड में दलितों और निम्न जातियों के लोगों के घर जला दिए गए थे ठीक इसी तरह महाभोज में भी इसकी खासी बानगी दिखलाई पड़ती है। महाभोज उपन्यास में सिर्फ तत्कालीन राजनीतिक दुराचारों की पोल का खुलासा ही नहीं बल्कि आज की राजनीति का पर्दाफाश भी हुआ है।

बीसू और बिंदा आदि अनेक लोगों द्वारा दलित उत्थान और दलितों में अधिकारों के प्रति जागरूकता आदि प्रसारित करने का पूर्ण प्रयास किया जाता है। किन्तु जोरावर और दा साहब जैसे दोहरे चरित्र के लोग बीसू और बिंदा की कोशिशों पर पानी फेर देते हैं, न सिर्फ पानी फिरते हैं बल्कि उन्हें खत्म करने का पूरा रोडमैप तैयार कर लेते हैं। आज भी अनेक बीसू और बिंदा समाज में दिखाई पड़ सकते हैं किंतु इसी तरह के जोरावर और दा साहब जैसे लोगों की भी कोई कमी नहीं है जो अनेक बीसू और बिंदा की दर्दनाक हत्या करवा देते हैं।

राजनीति का अपराधीकरण और अपराधीकरण की राजनीति इससे भलीभांति स्पष्ट हो जाती है। समकालीन राजनीति में अनेक दा साहब जैसे नेताओं से आप रूबरू हो सकते हैं जिन का दोहरा चरित्र और दोहरा मुखौटा होना आम बात हो गई है। किस तरह दलित, शोषित, वंचित, पीड़ित आदि अनेक निम्न वर्गीय समूहों को वोट बैंक की राजनीति में घसीट कर मनुष्य से इतर मतदाता बनने की होड़ चल पड़ी है।

लोकतंत्र का प्रहरी और चतुर्थ स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया किस तरह राजनेताओं के चंगुल में फंस जाता है और उनकी चरण वंदना और स्तुति करने में लगा रहता है इसकी बानगी महाभोज में भली-भांति देखी जा सकती है। समकालीन राजनीतिक परिदृश्य पर दृष्टिपात करने पर भी कुछ स्थिति परिवर्तित नहीं हुई है, बल्कि मैं तो ऐसा मानता हूं कि स्थिति और भी खराब होती गई है। आज भी अनेक दत्ता बाबू मो द्वारा मशाल जैसे अनेक अखबारों का संपादन किया जा रहा है और वह महिमामंडन और गाथा गाने की सुधीर परंपरा यूं ही आगे बढ़ रही है। जिस मीडिया को सशक्त विपक्ष माना जाता है उस मीडिया की चाटुकारिता हद दर्जे तक आगे बढ़ चुकी है। यह आरोप सिर्फ प्रिंट मीडिया को लेकर ही नहीं यह स्थिति इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक में कमोवेश ऐसी ही बनी हुई है, कुछ ही लोग ऐसे दिखलाई पड़ते हैं जो आज ही लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रहरी बने हुए हैं।

21 वीं सदी के दा साहब और दत्ता बाबू का मेल मिला अब किसी से छुपा नहीं है आज के संपादक मशाल जलाकर समाज में प्रकाश नहीं वरण समाज में आग लगाने का कार्य भली-भांति करना सीख गए हैं। उपन्यास के पात्र सक्सैना के व्यक्तित्व से स्पष्ट होता है कि पुलिस में सभी लोग भ्रष्ट नहीं होते, सक्सैना की संवेदनशीलता इस बात का परिचायक है कि आज भी पुलिस व्यवस्था में अच्छे लोग विद्यमान हैं पर आज भी अनेक लालची डीआईजी सिन्हा दिखलाई पड़ जाएंगे जो अपने प्रमोशन के लिए किसी को तबाह करने में संकोच नहीं करते।

जिस प्रकार उपन्यास में राजनीतिक रसूख और आतंक जोरावर का है ऐसे अनेक जोरावर गांव कस्बों में मिल जायेंगे जिन के लिए लोकतंत्र का मतलब है दहशतगर्दी और आतंक फैलाना, जिस प्रकार महाभोज में दा साहब दोहरे चरित्र के व्यक्तित्व के धनी दिखलाई पड़ते हैं ठीक उसी प्रकार धर्म का चोला ओढ़े आज भी अनेक नेता राजनीति में सक्रिय हैं जो धर्म का आवरण ओढ़ घिनौने से घिनौना कार्य करने से नहीं चूकते।

इस उपन्यास को आप भारत के किसी भी राज्य की राजनीति से जोड़कर देख सकते हैं आपको स्थिति समान ही दिखलाई पड़ेगी, सत्ता, मीडिया, पुलिस, तंत्र और जोरावर जैसे आतंकियों की गठजोड़ से जनता कभी मुक्त न हो पाई है। इस तरह के गठजोड़ जनता को मूर्ख बनाने में लगे रहते हैं, यह मूर्ख बनाने की प्रक्रिया किसी एक खास दल या सरकार में नहीं होती यह सतत रूप से चलती रहती है।

राजनीतिक परिदृश्य की बात करें तो कमोबेश स्थिति जस की तस बनी हुई है, इस धमाचौकड़ी और कुचक्र में सक्सेना जैसे लोग उम्मीद की लौ जलाई दिखलाई पड़ते हैं। आज के बीसू और बिंदा कब समाज के निम्न वर्गीय लोगों की आवाज को बुलंद कर पाएंगे यह कहना तो अत्यंत मुश्किल है।


आज के परिवेश में भ्रष्ट नेताओं द्वारा फैलाई गयी भ्रष्ट राजनीति के इस दुरंगेपन को लेकर रजनी गुप्त महाभोज के संदर्भ में लिखती है – “नेताओं की खोखली नारेबाजी, कुत्सित इरादे और दमघोंटू साजिशों की अंतहीन सच्चाइयों को पूरी बेबाकी से चीरते ‘महाभोज’ की प्रासंगिकता आज भी बहुत जरूरी हस्तक्षेप है जो चमकते-चिकने चेहरों को समझने के लिए सार्थक बयान करते हुए आमजन की विवशता और उनकी असहाय स्थितियों का जीवंत दस्तावेज बन जाता है।”


पाठकों द्वारा इन्हें भी बेहद पसंद किया गया है आप भी पढ़ें:




No comments

Powered by Blogger.