किन्हें रचता, यदि मैं होता भगवान।
महान व्यक्तित्वों कि इस सुंदर परंपरा में मैं सर्वप्रथम उस बुद्ध को बनाता जिसने "आत्म दीपो भवः" कहकर संसार में प्रकाश फैलाया, उन्होंने ज्ञानरूपी दीपक के माध्यम से न सिर्फ समाज में प्रकाश फैलाया बल्कि उसे एक नए ढंग से सोचने की दृष्टि भी दी। इसी तरह ऐसे ही महान दार्शनिक सुकरात को बनाता जिसने जहर पीकर ज्ञान का लोहा मनवाया, इंसानों को बनाने की इसी कड़ी में मैं प्लेटो और अरस्तू जैसे महान दार्शनिकों की भी रचना करता। साथ ही मैं ऐसे ही महापुरुष आदि गुरु शंकराचार्य को भी बनाता जिसने भारतीय दर्शन को न सिर्फ ऊंचाइयों तक पहुंचाया बल्कि उसे नाना प्रकार के आयाम भी दिए। जिसने अहम् ब्रह्मास्मि कहकर मनुष्य के भीतर उस विश्वास को जगाया कि ब्रम्हा और जीव के मध्य द्वैत संबंध न होकर अद्वैत संबंध है।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय।।
मैं ऐसे ही बाबा कबीर को बनाता जिसने समाज में प्रेम को सही रूप में अमलीजामा पहनाया, प्रेम और सद्भावना की बात करने वाले कबीर ने न सिर्फ जातीय ऊंच-नीच को खत्म करने की बात की बल्कि धार्मिक कट्टरपंथ से भी दो-दो हाथ किए। मैं उस माँ मीरा को भी बनाता जिसने अपने प्रेम के बूते विष को अमृत में बदल दिया और प्रेम को चरमोत्कर्ष की पराकाष्ठा तक पहुंचाया।
मैं उस हेलेन केलर की भी रचना करता जिसने तमाम चुनौतियों से पार पाकर अपने संघर्ष से न सिर्फ इतिहास रचा बल्कि संसार में उम्मीद की लौ भी जलाई। विश्व भ्रातृत्व की आवाज बुलंद करने वाले में उस स्वामी विवेकानंद को भी बनाता जिसने समाज को अपने योगदान से नए मूल्य दिए। इसी तरह इंसानों को बनाने कि इसी कड़ी में मैं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तथा वैश्विक पटल पर हुए अनेक राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में जीवन खपा देने वाले उन तमाम लोगों को बनाता जिन्होंने अपने जीवन में ऐसे काम किए जिनका दुनिया आज भी लोहा मानती है।
मैं ऐसे महापुरुष महात्मा गांधी को बनाता जिसने दुनिया को अहिंसा और सत्य का पाठ पढ़ाया साथ ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय भूमिका निभाई। मैं ऐसे बाबासाहेब अंबेडकर को भी बनाना नहीं भूलता जिन्होंने न सिर्फ दलित उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया बल्कि स्त्री अस्मिता के प्रश्नों को भी मुख्यधारा में लाकर खड़ा कर दिया साथ ही भारतीय संविधान के शिल्पी के रूप में जाने गए। मैं मदर टेरेसा जैसी महान विभूति को भी बनाना कभी न भूलता जिन्होंने जनसेवा को ही अपना धर्म समझा। मैं उस जवाहरलाल को भी बनाता जिसने बेहद मुश्किल की घड़ी मे डटकर सामना किया और देश को अपना सफल नेतृत्व प्रदान किया, साथ ही जिसने पंथनिरपेक्षता की आवाज को बुलंदी दी। मैं उस पटेल को बनाना कभी न भूलता जिसमें 565 से अधिक देसी रियासतों को एक कर भारतीय राष्ट्र का निर्माण किया। मैं उस शास्त्री को न बनाने की गलती कभी न करता जिसने "जय जवान जय किसान" जैसा नारा देकर राष्ट्र का मुश्किल घड़ी में नेतृत्व किया।
जहां एक ओर मैं सरदार पटेल जैसे लौह पुरुष को बनाता तो वहीं दूसरी ओर लौह महिला कही जाने वाली इंदिरा गांधी को बनाना कभी न भूलता जिसने भारतीय राजनीति में नए अध्याय जोड़ दिए। इसी कड़ी में मैं अटल बिहारी और एपीजे अब्दुल कलाम जैसी महान विभूतियों को भी बनाना न भूलता जो न केवल भारतीय राष्ट्रीयता के गौरव हैं बल्कि नई पीढ़ी के लिए आदर्श व्यक्तित्व भी हैं।
विश्व पटल पर दृष्टिपात करें तो मैं उस कार्ल मार्क्स को बनाना अनिवार्य समझता जिसने मजदूरों की आवाज को अपनी आवाज देकर दृढ़ता प्रदान की। इसी तरह चार्ल्स डार्विन और गैलीलियो जैसी महान विभूतियों को बनाना मेरे लिए अनिवार्य हो जाता जिन्होंने तार्किक कसौटियों में न केवल जीवन बल्कि धर्म को भी कसा, इसी कड़ी में रामास्वामी नायकर और ओशो जैसी महान विभूति भी मेरी प्राथमिकताओं में अवश्य ही रहती।
इसी प्रकार मैं उन सभी लोगों को बनाता जिन्होंने किसी न किसी स्तर पर अपने योगदान से विश्व में नए आयाम जोड़ें और विश्व शांति का तत्व अहिंसा और सत्य जैसे महान मूल्यों को स्थापित किया। साथ ही सामाजिक सद्भावना, जाति ऊंच-नीच का विरोध, धार्मिक कट्टरपंथ इत्यादि से ऊपर उठकर अपने उद्देश्य के माध्यम से विश्व में समृद्धि लाने का प्रयत्न किया।
यह सब पढ़कर पाठकों के मन में यह अवश्य जिज्ञासा उठ रही होगी कि मैंने इन्ही उपरोक्त इंसानो को ही क्यों बनाया? इसके लिए मेरा सीधा सपाट उत्तर यही है कि ऐसा मात्र मेरे संकुचित और अल्पज्ञान के चलते ही हुआ है। पाठकों के मन में दूसरा प्रश्न हिलकोरे मार रहा होगा कि इन लोगों को बनाकर मैं आखिर किस उद्देश्य पूर्ति की ओर अग्रसर होता? उद्देश्य मात्र यही है कि मेरे समक्ष सर्वप्रथम प्रश्न वरीयता का था, वरीयता क्रम के आधार पर इन लोगों की रचना करके मैं उन सभी मूल्यों आदर्शों आदि को न सिर्फ समाज में स्थापित करता बल्कि उसे अमलीजामा पहनाने का भी प्रयत्न करता।
इसमें तो कोई दो राय नहीं कि विश्व नक्षत्र में अनेकों सितारे हैं जिनकी चमक अनंत युगों तक यूं ही बरकरार रहेगी और मुझे यह ज्ञात है कि मेरी अपनी अज्ञानता के चलते मैंने कई सितारों को अपनी रचना की कड़ी में नहीं जोड़ा, किंतु फिर भी यदि समग्र और सारगर्भित रूप में कहा जाए तो मैं उन सभी लोगों को बनाता जिन्होंने प्रेम, सद्भावना, विश्व शांति, विश्व भ्रातृत्व, सत्य, अहिंसा न जाने ऐसे ही कितने ही तमाम तरह के मूल्यों को न सिर्फ दिया बल्कि उसे जी कर भी दिखाया। उद्देश्य मात्र यही रहता कि दुनिया जहान सही मायनों में प्रगति पथ पर अग्रसर रहे।
लेखक - सोनू

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