प्रेमचंद और आज का होरी
गोदान उपन्यास की मुख्य समस्या किसान समस्या है जिसमें होरी के माध्यम से किसानों पर हो रहे अत्याचार को प्रदर्शित किया गया है। आज भी भारत में करोड़ों होरी इस समस्या से जूझ रहे हैं, जहां एक ओर होरी गोदान उपन्यास का नायक है तो वही धनिया को नायिका का स्थान दिया गया है। धनिया अत्याचारों को झेलती नहीं बल्कि उसका विद्रोह स्वर समय-समय पर प्रखर होता है। इसकी बानगी उपन्यास के अनेक पृष्ठों पर देखी जा सकती है।
इस उपन्यास के माध्यम से 1930-40 के दशक की महाजनी व्यवस्था को प्रदर्शित किया गया है। किस प्रकार साहूकार किसानों को नोच नोच कर खा जाते हैं इसका सफल चित्रण उपन्यास में प्राप्त होता है। जहां एक ओर सभी अत्याचारों से दो-चार होता हुआ होरी किसान बने रहने में अपनी मर्जात समझता है तो वहीं दूसरी ओर होरी और धनिया का पुत्र गोबर शहर जाकर मजदूरी कर जीवन यापन करता है। इस व्यवस्था के दलदल में न फंस कर गोवर मजदूरी को ही सही समझता है।
उपन्यास में ग्रामीण अंचल के चित्र के साथ-साथ शहरी चित्रण भी किया गया है। राय साहब द्वारा तनख्वाह के शेयर खरीदे जाना, सभी मेहमानों को डालियां भिजवाना आदि। न जाने इस तरह के कितने ही प्रकरण बड़े लोगों की बड़ी बड़ी बातों का पर्दाफाश करते हैं। इस उपन्यास को समस्त भारत का चित्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें समस्त ग्राम्य जीवन को समेट कर रख लिया है इसमें साहूकारों और महाजनों के अत्याचार भी हैं, किसानों का बर्बर जीवन भी, जाति व्यवस्था का मकड़जाल भी और भी अनेक समस्याएं आदि।
होरी के समग्र जीवन के संघर्ष के द्वारा किसानों का चित्र खींचा गया है तो सिलिया और उसके घर वालों के द्वारा दलित चेतना के प्रश्न को भी उठाया गया है, धनिया के द्वारा एक भारतीय नारी का चित्र भी खींचा गया है। जो ग्रामीण व्यवस्था के मकड़जाल से निकलने की बार-बार कोशिश करती है और उसका विद्रोही स्वर इस बात की गवाही देता है। प्रेमचंद की दूरदर्शिता भी इस उपन्यास में देखते ही बनती है मालती और मेहता के माध्यम से प्रेमचंद ने 1936 में लिविंग रिलेशनशिप की अवधारणा प्रस्तुत कर दी, इन दोनों के संबंध को कमोबेश वैसा ही दिखाया गया है जैसा आज लोग लिविंग रिलेशनशिप के अंतर्गत रहते हैं। थोड़ा बहुत अंतर पाठक अवश्य कर सकते हैं किंतु लगभग ऐसा कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि लिविंग रिलेशनशिप जैसा कुछ-कुछ 1936 में प्रेमचंद ने मालती और मेहता के द्वारा प्रस्तुत कर दिया था।
इस उपन्यास को जितनी भी बार पढ़ा जाए हर बार नए बिंदु पाठक प्राप्त कर सकते हैं। मीनाक्षी के माध्यम से भी नए रुप में नारी चेतना को उभारने का कुछ कुछ प्रयास मिलता है। समीक्षात्मक दृष्टि से यह उपन्यास सफल बन पड़ा है। भाषा शैली की यदि बात की जाए तो जिस हिंदुस्तानी की बात महात्मा गांधी किया करते थे उसी को लिपिबद्ध करने का कार्य प्रेमचंद ने भलीभांति किया है। सफल वातावरण भी उपन्यास के अनेक हिस्सों में प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए मथुरा और सिलिया का करीब आना। संवाद की दृष्टि से भी उपन्यास सर्वोच्च कोटी का दिखाई पड़ता है, उदाहरण के तौर पर होरी और धनिया के बीच हो रही बातचीत। इसी तरह समीक्षा के समस्त तत्वों के आधार पर उपन्यास श्रेष्ठ है।
ऐसी प्रतीति होती है कि आज भी अनेक गोबर और होरी 1936 के ही हैं। क्योंकि समस्याएं तो वही बनी हुई हैं, जो 1936 में थीं उन्हीं समस्याओं से कमोवेश आज का किसान और मजदूर वर्ग जूझ रहा है। सरकारी आंकड़े की ही बात की जाए तो 25,000 से अधिक कमाने वाले मात्र 10% लोग भारत में निवास करते हैं, इस महंगाई के दौर में आप बहुत से होरी और गोबर से भेंट कर सकते हैं। ऐसा कहना अतिशयोक्ति पूर्ण न होगा कि आज समस्याएं कम होने की बजाय बड़ी ही हैं। कथा सम्राट प्रेमचंद के लिए सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उनके उपन्यासों की प्रासंगिकता बढ़ने की बजाय कम हो। साथ ही उन समस्याओं से आज का किसान व मजदूर न जूझे जिन समस्याओं से 1936 में जूझ रहा था।
लेखक - सोनू
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