सलाम कहानी, ग्रामीण परिवेश में दलित
कहानी की अगली प्रमुख घटना चाय की दुकान की है, हरीश का मित्र कमल उपाध्याय जब चाय की दुकान पर चाय पीने के लिए जाता है तो पहले तो चाय वाला उसे चाय देने के लिए हां कर देता है किंतु जैसे ही उसे उसकी जाति का अंदाजा होता है और उसे पता चलता है कि वह व्यक्ति बारात में आया है तो वह चाय देने से इंकार कर देता है। कमल उपाध्याय यह देखकर अचकचा जाता है और चाय न देने की वजह तलाशने की कोशिश करता है, चायवाला कहता है कि वह चूडो की बारात में आया है अतः उसे चाय नहीं दी जाएगी। यह देख कर कमल उपाध्याय पूर्ण रूप से सकपका जाता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि के शब्दों में देखें तो पाते हैं कमल उपाध्याय उस बियाबान जंगल में चारों तरफ जंगली जानवरों से घिरा हुआ खड़ा था, जहां से बच पाना मुश्किल था।
कमल उपाध्याय अपनी जाति से चाय वाले को अवगत कराता है और यह बताता है कि वह सवर्ण है दलित नहीं, इससे यह स्पष्ट रूप से पता चलता है कि जाति के बीज तो कमल उपाध्याय की मानसिकता में भी थें, जाति रूपी इस कीड़े से तो वह भी ग्रसित था क्योंकि जिस प्रकार एक योद्धा युद्ध की विकट स्थिति में अपने सर्वश्रेष्ठ हथियारों का प्रयोग करता है ठीक उसी प्रकार कमल उपाध्याय द्वारा अपनी जाति को बता दिया जाना उस स्थिति से बाहर निकाल देता है जिस बियाबान जंगल में वह खड़ा था उसे वहां से बाहर निकलने का यही रास्ता मिलता है।जिससे यह स्पष्ट होता है कि जाति के बीच तो कमल उपाध्याय के मानस पटल पर भी भली-भांति जमे हुए थे। क्योंकि कमल उपाध्याय अपने आप को सबसे बुरी स्थिति में पाकर जाति रुपी हथियार से ही मुकाबला करना चाहता है, कमल उपाध्याय द्वारा जाति का बताया जाना एक प्रमाण पत्र जैसा ही लगता है, जैसे कि हम प्रमाण पत्र दिखाकर अपनी प्रामाणिकता को साबित करते हैं।
चाय दुकान की अगली घटना दलित स्त्री के प्रश्न को सामने लाती है। गांव का पहलवान कहे जाने वाला व्यक्ति जिस लड़की की शादी हो रही थी उस पर छींटाकशी करता है। और कहता है कि जुम्मन को इस गांव में ही लड़की की शादी करनी चाहिए थी, और यह कह कर हंसने लगता है और साथ के लोग भी उसकी हंसी में अपनी हंसी घोल देते हैं। पहलवान द्वारा उस लड़की पर योनिक छींटाकशी की जाती है, इससे पता चलता है कि दलित स्त्री दोहरे दंश का शिकार होती है। उसकी गुजर-बसर करने की स्थितियां भी कितनी भयावह हैं उसका मार्मिक चित्रण दिखाई पड़ता है।
कमल उपाध्याय की मां द्वारा कमल उपाध्याय को यह समझाया जाना कि यह दलित लोग छोटे होते हैं गंदे होते हैं इनके साथ नहीं रहना चाहिए आदि इत्यादि यह अपने आप में यह स्पष्ट करता है कि पितृसत्तात्मक समाज ने एक स्त्री के मानस पटल को किस तरह से अपने हिसाब से मिलकर अपने बीज बो दिए हैं। यह बीज जाति और पितृसत्तात्मक समाज की गहरी जड़ों की प्रमाणिकता को स्पष्ट करते हैं। जाति की यह ठसक समाज में आज भी बहुत हद तक विद्यमान है। कहानी की अंतिम मुख्य घटना एक रस्म के साथ होती है, इसे सलाम की रस्म कहा जाता है हरीश मिले हुए सभी बर्तन और कपड़े लौटाने की बात करता है साथ ही वह कहता है कि वह सलाम के लिए किसी भी अपरिचित के घर नहीं जाएगा। वह इस रस्म का पूर्ण रूप से प्रतिकार और प्रतिरोध करता है वह प्रक्रिया जो सदियों से निरंतर की जा रही है एक रस्म का रूप ले लेती है। उसी रस्म को एक झटके से हरीश तोड़ कर रख देता है क्योंकि उसके पीछे सवर्णों की साजिश दिखाई पड़ती है इसके माध्यम से ऊंची जाति के लोग स्वयं को दाता के रूप में दिखाते हैं और दलितों को स्वीकारकर्ता के रूप में। किंतु हरीश स्वीकारकर्ता न बन कर उनकी साजिश का पर्दाफाश कर देता है।
उस रस्म के पीछे की साजिश से पर्दा उठा कर हरीश उस कृत्य को सदा के लिए खत्म करना चाहता है। किस हद तक जाति से भारतीय समाज ग्रसित है उसकी बानगी इस कहानी के माध्यम से स्पष्ट होती है। यह कहानी इस बात की ओर भी गहरा संकेत करती है कि एक दलित स्त्री न सिर्फ स्त्री होने के दंश को झेलती है बल्कि दलित और स्त्री होने के दोहरे दंश का सामना करती है। यह घटनाएं इस पुरुष प्रधान समाज और जातिवादी समाज की घालमेल को सामने लाती हैं। और जातिवादी और पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता के रेशे को उधेड़ कर रख देती हैं।
रस्म को एक झटके में तोड़ा जाना यह दिखाता है कि दलित समाज अब धीरे-धीरे शिक्षित होता जा रहा है। यूं ही बढ़ता हुआ शिक्षा का स्तर दलितों के जीवन में क्रांति ला देगा जैसे-जैसे दलित समाज में शिक्षा का स्तर बढ़ता जाएगा वैसे ही यह रस्मे टूटने लगेंगी। और रस्म के नाम पर किए जाने वाले अत्याचार से भी दलित वर्ग बच जाएगा। समग्रता में कहें तो सलाम कहानी उन कुपरंपराओं और कुप्रथाओं को मिटाने का कार्य करती है जिसने दलित समाज के जीवन स्तर को नीचे रखा हुआ है और उनके जीवन स्तर को ऊपर नहीं उठने देती। उन सभी कुपरंपराओं और कुप्रथाओं पर गहरी चोट की गई है।

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